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पर्यावरण| पारिस्थितिक तंत्र के प्रकार

पारिस्थितिक तंत्र के प्रकार 

पारिस्थितिकी तंत्र को दो वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-  1. प्राकृतिक पारितंत्र 2.कृत्रिम पारितंत्र



प्राकृतिक पारितंत्र 

इसे दो भाग में बांट सकते हैं- 1. स्थलीय पारितंत्र 2.जलीय पारितंत्र

स्थलीय पारितंत्र - इसके अंतर्गत  वन पारितंत्र ,घास पारितंत्र, मरुस्थलीय पारितंत्र, टुंड्रा पारितंत्र को शामिल किया जाता है .

जलीय पारितंत्र 

इसे पुनः दो भाग में बांट सकते हैं

1.लवणीय पारितंत्र - इसके अंतर्गत समुद्री पारितंत्र ,प्रवाल भित्ति ,एश्चुरी पारितंत्र को शामिल किया जाता है .

2.ताजा पानी पारितंत्र -

  • रुका हुआ ताजा पानी पारितंत्र- इसके अंतर्गत झील, तालाब, दलदली व कीचड़ युक्त क्षेत्र आता है.
  • गतिशील ताजा पानी  पारितंत्र-  इसके अंतर्गत नदी व्  झरना  पारितंत्र को शामिल किया जाता है.

आर्द्रभूमि पारितंत्र-  इस प्रकार का पारितंत्र लवणीय या समुद्री दलदली क्षेत्र में पाया जाता है.

कृत्रिम  पारितंत्र-  इसके अंतर्गत फसल क्षेत्र पारितंत्र ,उद्यान पारितंत्र, एक्वेरियम पारितंत्र को शामिल किया जाता है.

पर्यावरण | पारिस्थितिकी तंत्र

 पारिस्थितिकी तंत्र (ECOSYSTEM)

जीवो के समुदाय और साथ ही वह पर्यावरण जिसमें में निवास करते हैं, पारिस्थितिकी तंत्र कहलाता है. ओडम के अनुसार  जैविक समुदाय और अजैविक घटकों के  अंतर्संबंधों से निर्मित  संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई को पारिस्थितिकी तंत्र कहते हैं.



पारिस्थितिकी(Ecology)

यह ग्रीक भाषा के शब्द ओकोस(oikos) अर्थात घर और लोगोस(logos) अर्थात अध्यनन से मिलकर बना है । इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अर्नेट्स हैकल किया था ।

पारिस्थितिकी तंत्र के घटक 

इसके तीन घटक है - अजैव घटक , जैविक घटक और ऊर्जा संघटक ।

अजैविक घटक -ऐसे निर्जीव पदार्थ जो जीवो को किसी न किसी रूप में प्रभावित करते हैं अजैविक घटक कहलाते हैं जैसे मिर्धा हवा जल कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ।

अजैवीय घटकों  को मुख्य रूप से चार भागों में बांट सकते हैं-

  • जलवायु संबंधी कारक -इसमें तापमान, प्रकाश, हवा, आर्द्रता आदि आते हैं .
  • मृदा संबंधी कारक -यह मृदा की संरचना और संगठन से संबंधित है.
  • अकार्बनिक पदार्थ -जल, फास्फोरस, सल्फर, नाइट्रोजन आदि पदार्थ.
  • कार्बनिक पदार्थ -प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा आदि.

जैविक घटक -इसके अंतर्गत सजीव जीवो को शामिल किया जाता है जिसमें पौधे जंतु एवं सूक्ष्मजीव आते  हैं। जैविक घटक को निम्न वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है

  1. स्वपोषी -ऐसे पौधे और जंतु जो भोजन का निर्माण स्वयं करते हैं स्वपोषी कहलाते हैं ,इसलिए  इन्हें उत्पादक कहा जाता है और इन्हें प्रथम पोषण स्तर के अंतर्गत रखा जाता है। इसके अंतर्गत हरे पौधे और शैवाल व् कुछ बैक्ट्रिया आते है।
  2. परपोषी -ऐसे जीव जो भोजन के लिए पौधों व् जंतुओं या दोनों पर निर्भर करते है , परपोषी कहलाते है । 

भोजन के स्रोत के आधार पर इसे 3 वर्गों में बाँट सकते है -

  • शाकाहारी - ऐसे जीव जो अपना भोजन पौधों से प्राप्त करते है। इन्हें प्राथमिक उपभोक्ता कहा जाता है।जैसे - गाय , हिरण , बकरी । पोषण स्तर में द्वितीयक स्तर में होते है।
  • मांसाहारी -ऐसे जीव जंतु जो अपना भोजन जंतुओं से प्राप्त करते है।इन्हें पुनः दो वर्गों में बांट सकते हैं- पहले वर्ग में ऐसे जीव  जो केवल शाकाहारी जंतुओं को खाते हैं। यह द्वितीयक  उपभोक्ता कहलाते हैं और पोषण स्तर में इनका स्तर तीसरा होता है।दूसरे वर्ग में ऐसे जियो जो शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के जीवो को खाते हैं। यह तृतीयक उपभोक्ता कहलाते हैं और पोषण स्तर में इनका क्रम चौथा होता है।
  • सर्वाहारी -ऐसे जीव जो अपना भोजन पौधों और जंतुओं दोनों से प्राप्त करते हैं उन्हें सर्वाहारी कहा जाता है जैसे मनुष्य।
  • मृतपोषी या अपघटक-यह भी एक प्रकार के परसों परपोषी होते हैं जो मृत पदार्थों में मौजूद जटिल कार्बनिक पदार्थ को सरल और कार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं जैसे बैक्टीरिया और कवक




पर्यावरण || जैव ईंधन

 जैव ईंधन (biofuel) -   जीव जंतुओं से प्राप्त होने वाले पदार्थों को मूल रूप में या रूपांतरित करके जब ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है तब इसे जैव ईंधन कहते है। जैव ईंधन (biofuel) भविष्य का ईंधन माना जा रहा है। वर्तमान में भी इनका कुछ मात्रा में उपयोग हो रहा है। जैसे - बायोएथेनॉल, बायोडीजल, बायो गैस (गोबर गैस), हाइड्रोजन गैस। 

छत्तीसगढ़ में बायोडीजल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ बायोडीजल विकास प्राधिकरण के गठन 2005 में किया गया है।



1. बायो एथेनॉल - यह एक प्रकार का एल्कोहॉल है जो बड़े पैमाने पर ईंधन के रूप में आसानी से उपयोग किया जा सकता है। कुछ मात्रा में एथेनॉल को  पेट्रोल के साथ मिलाकर के कुछ देशों में उपयोग किया जा रहा है। एथेनॉल को 100 प्रतिशत शुद्ध रूप में भी वाहनों में उपयोग किया जा सकता है।

एथेनॉल का उत्पादन किसी भी प्रकार के कार्बोहायड्रेट के किण्वन (fermentation) से किया जा सकता है। फर्मेंटेशन सूक्ष्मजीवों के माध्यम से होता है जैसे - यीस्ट, कुछ एनारोबिक बैक्टीरिया । पौधों से प्राप्त होने वाले किसी भी प्रकार के कार्बोहायड्रेट (शर्करा) जैसे स्टार्च, सेल्यूलोज को शर्करा (sugar) के सरल रूप ग्लूकोस या सुक्रोस  में तोड़ लिया जाता है। बाद में सूक्ष्मजीवों के माध्यम से इसमें किण्वन (fermentation) किया जाता है जिसमें एथेनॉल का उत्पादन होता है। 

फर्मेंटेशन बड़े बड़े (bioreactor) बायोरिएक्टर में किया जाता है जिसमे उपयुक्त कल्चर माध्यम में सूक्ष्मजीवो की वृद्धि की जाती है । सुक्रोस या ग्लूकोस इनके लिए भोजन का कार्य करता है जिसके अनाक्सी रेस्पिरेशन से एथेनॉल बनता है और सूक्ष्मजीवों के लिए ऊर्जा मिलती है।

2. बायोडीजल (biodiesel) - पौधों तथा जंतुओं से प्राप्त होने वाले तेल (oil) या वसा (fat) में ट्रांसेएस्टरीफिकेशन (transesterification) रिएक्शन से बायोडीजल बनाया जा सकता है। इसकी तकनीकि विकसित की जा चुकी है। हमारे छत्तीसगढ़ राज्य में भी रतनजोत (Jatropha) के तेल से बायोडीजल बनाया जाता है। जिससे गाड़िया भी चलाई जा रही है और हवाई जहाज को ईंधन के रूप में सफलता प्रयोग किया गया है। सामान्य डीजल और पेट्रोल धरती में सीमित मात्रा में  है जो कुछ दशकों में खत्म हो जाएंगे। तब बायोडीजल ही ईंधन का स्रोत बनेगा।

बायोडीजल बनाने के लिए तेल को शुद्ध किया जाता है जिससे तेल में उपस्थित दूसरे पदार्थ अलग कर दिए जाते है। फिर तेल को मेथेनॉल और एक उत्प्रेरक केमिकल को मिलाया जाता है। 60 ℃ तापमान पर रिएक्शन कराया जाता है तब तेल से ग्लिसरॉल अलग हो जाता है और फैटी एसिड  ऊपर में एक हाइड्रोफोबिक लेयर के रूप में प्राप्त होता है जो बायोडीजल के रूप में उपयोग किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया 3 चैम्बर में होती है। मिक्सिंग चैम्बर, रिएक्शन चैम्बर और सेपरेशन चैम्बर।

3. बायोगैस (गोबर गैस) - चौपाये पालतू जानवरों के गोबर के सड़ने पर मीथेन जैसी गैसे निकलती है जो ज्वलनशील होती है। इन्हें घरों में खाना पकाने में उपयोग किया जाता है। यह काफी विकसित तकनीकी है जिसका लंबे समय से उपयोग किया जाता रहा है। परंतु प्राकृतिक गैस के खत्म हो जाने पर भविष्य में इसके बड़े पैमाने पर उपयोग की संभावना है। 


4. बायो हाइड्रोजन गैस (H2) - यह इको फ्रेंडली ईंधन है। हाइड्रोजन गैस के जलने पर CO2 गैस नही निकलती है क्योंकि इसमें कार्बन नही होता है। इसमे केवल हाइड्रोजन के 2 परमाणु पाए जाते है। 

हाइड्रोजन गैस का उत्पादन कुछ जीवाणुओं (bacteria) और शैवालों के द्वारा किया जा सकता है। इन जीवों में हायड्रोजिनेज (hydrogenase) नामक एंजाइम पाया जाता है जो हाइड्रोजन गैस के उत्पादन में जरूरी होता है। हाइड्रोजिनेज एंजाइम एनारोबिक कंडीशन में ही कार्य करता है। शैवाल की एक स्पीशीज (Chlamydomonas reinhardtii) से हाइड्रोजन गैस के उत्पादन की अत्यंत संभावना है। इस पर काफी सारे रिसर्च चल रहे है। इस शैवाल को सुल्फर की कमी वाले कल्चर माध्यम में उगाने पर  ये हाइड्रोजन गैस का उत्पादन करने लगता है। क्लैमाइडोमोनास एक कोशिकीय शैवाल है जिसे आसानी से किसी बायोरिएक्टर (bioreactor) में उगाया जा सकता है। हाइड्रोजन गैस का भविष्य में ईंधन के रूप में ज्यादा से ज्यादा उपयोग की संभावना है क्योंकि ये पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुचाता है।


पर्यावरण || ग्लोबल वार्मिंग

 Algae in global warming 

(ग्लोबल वार्मिंग के नियंत्रण में शैवालों की भूमिका) algae can control global warming  - ग्लोबल वार्मिंग अर्थात वैश्विक तापन को नियंत्रित करने में शैवालों की अहम भूमिका है। शैवाल (algae) पूरे विश्व मे हर जगह पाए जाते है। पूरी धरती की सतह में ज्यादातर भाग में जल है । शैवाल जल में उगती हुई पायी जाती है जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा काफी मात्रा में CO2 अवशोषित करके शुगर के निर्माण में उपयोग कर लेते है। इस प्रकार शैवाल CO2 की मात्रा को कम करने में मदद करते है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए सबसे ज्यादा CO2 गैस ही जिम्मेदार होती है अतः CO2 गैस की मात्रा में कमी होने पर ग्लोबल वार्मिंग कम होता है।


भविष्य में शैवालों का ग्लोबल वार्मिंग के नियंत्रण में  महत्व और ज्यादा बढ़ने वाला है क्योंकि भविष्य में शैवालों से जैव ईंधनों (Biofuel) का उत्पादन भी काफी मात्रा में होने लगेगा। शैवालों से बायो हाइड्रोजन गैस एवं बायो एथेनॉल जैसे इको फ्रेंडली जैव ईंधनों का उत्पादन किया जा सकता है। इस पर काफी सारे शोधकार्य चल रहे है। ये दोनों ईंधन पर्यावरण के लिए कम नुकसानदायक है क्योकि इनके जलने पर कम मात्रा में CO2 गैस निकलती है।




1.  हाइड्रोजन गैस (H2) के जलने पर तो CO2 गैस निकलती ही नही है क्योंकि इसमें कार्बन होता ही नही है। शैवालों की एक स्पीशीज Chlamydomonas reinhardtii को सल्फर की कमी वाले कल्चर मीडियम में उगाने पर ये हाइड्रोजन गैस का उत्पादन करती है। हाइड्रोजन गैस के उत्पादन में hydrogenase नामक एंजाइम की भूमिका होती है जो anaerobic वातावरण अर्थात ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में कार्य करता है और हाइड्रोजन गैस का उत्पादन करता है।

2. बायो एथेनॉल (Bio ethenol) - शैवालों में कार्बोहायड्रेट विभिन्न रूपो जैसे स्टार्च , सुक्रोस और सेल्यूलोस के रूप में एकत्रित होती है। इस शर्करा को हाइड्रोलिसिस द्वारा monosaccharide  ग्लूकोस के रूप में तोड़ लिया जाता है। उसके बाद सूक्ष्म जीवों के द्वारा इसमें किण्वन (fermentation) करवाने पर एथेनॉल का उत्पादन होने लगता है।  

एथेनॉल को वाहनों में आसानी से उपयोग किया जा सकता है। 100 प्रतिशत शुद्ध रूप में या पेट्रोल के साथ मिलाकर दोनों प्रकार से ईंधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है। वर्तमान में पेट्रोल के साथ मिलाकर ही कुछ मात्रा में उपयोग किया जा रहा है। 

3. बायोडीजल (biodiesel)-  शैवालों से प्राप्त होने वाले (oil) ऑयल को  ट्रांसएस्टरीफिकेशन (transesterification) द्वारा बायोडीजल में बदला जा सकता है।  

बायोडीजल के जलने पर सामान्य डीजल पेट्रोल की तरह ही CO2 निकलता है परंतु जब हम शैवालों को उगाते है तब शैवाल प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) में काफी मात्रा में CO2 को अवशोषित कर लेते है। अर्थात शैवालों से बायोडीजल के उत्पादन करने पर अप्रत्यक्ष रूप से ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद मिलती है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि शैवाल दो प्रकार से ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद करते है। पहला प्रकाश संश्लेषण द्वारा CO2 को अवशोषित करके , दूसरा इको फ्रेंडली जैव ईंधनों के उत्पादन द्वारा कम CO2 उत्सर्जन करके ग्लोबल वार्मिंग कम करने में सहायता करते है ।